पुण्यतिथि के अवसर पर याद किए गए हिदायत अली कमलाकार

बेतिया :, सोमवार को हिदायत अली कमलाकर की पांचवीं पूण्य तिथि पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए गए। इस अवसर पर रायपुर के शिक्षाविद डॉ शाहिद अली ने कहां  मेरे पिता की यादें ही रह गई हैं, लेकिन उनके अहसास को अपने से जुदा नहीं होने दिया। एक जीवट ज़िंदादिल इंसान और भाईचारे के साथ लोगों के बीच सादगी भरा जीवन उनकी अपनी मिल्कियत थी। साहित्य और खेल को समर्पित उनका सारा जीवन सूफ़ी जैसा रहा।  साहित्य में कमलाकर और खेलों में हिदायत अली के नाम से उनको जानने और समझने वाले लोगों का अटूट प्यार उन्हें हमेशा उर्जावान बनाए रखता। इसलिए 70 साल होने पर भी खेल के मैदान में उनकी फूर्ती और मेराथन दौड़ में हिस्सा लेना नौजवानों में जोश भरने का काम करती थी । खेल के मैदान से जब उन्हें वक्त मिलता तो कलम और कागज से रिश्ता बना लेते। घंटों लिखा करते। न केवल लिखते बल्कि साहित्य संगोष्ठियों का आयोजन भी माह में एक बार नियमित तौर पर अपने निवास में कर लिया करते। शहर और आसपास के अंचलों से साहित्य प्रेमी संगोष्ठी में बहुत ही आत्मीय भाव से शामिल होते। उनके रचना संसार में बच्चों से लेकर इतिहास के वे सभी प्रसंगों की चर्चा होती जिनसे मानव मूल्यों की स्थापना होती है। इसलिए रचना कर्म विविधताओं से भरा था यथा - काठ का घोड़ा,कागज की नाव, बाल कविता भाग एक व दो, बाल नाटक, खंड काव्य -  वीणा, कालजयी, कहीं से भी पढ़ लो, बोलते खंडहर, कबीर से कमलाकर,समर्थ राम, नर - नारी- नारीश्वर,भक्ति काव्य - किसन मोहे तारो, अन्य साहित्य - अर्जुन का मोहमर्दन,कमलाकर के कलमदान से, प्रणय काव्य कथा - पाली का मंदिर,कैकई का संताप, अंतिम अरदास (गद्य ),नाटक - आजादी का पहला दिन। कवि, लेखक,समालोचक एवं साहित्यकार हिदायत अली कमलाकर जी देश-भर के अनेक सामाजिक साहित्यिक मंचों पर सम्मानित हुए।आकाशवाणी केंद्रों से अनेक वार्ताएं प्रसारित होती रही। अविभाजित मध्यप्रदेश में उनकी सबसे चर्चित कृति खंडकाव्य 'वीणा' मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति भोपाल में पं हरिहर निवास द्विवेदी सम्मान से वर्ष 1998 में अलंकृत किया। अखिल भारतीय साहित्य संगम, उदयपुर राजस्थान में उन्हें काव्य कौस्तुभ की मानद सम्मानोपाधि से नवाजा। खेल जगत में कोई खेल नहीं था जिसमें बाजी ना मारी हो। शताधिक खेलों के प्रतिष्ठित पुरस्कारों से अलंकृत हुए। वर्ष 2008 में छत्तीसगढ़ शासन ने उन्हें खेल विभूति सम्मान से विभूषित किया। स्टेंड बाल खेल का अविष्कार भी खिलाड़ी हिदायत अली ने किया। खेल और साहित्य का यह अनोखा प्रवाह वन्दनीय है। यूं तो उनके जीवन में शिष्यों और दोस्तों की बड़ी तादाद थी। लेकिन हमारे चाचा जी यानी प्रोफेसर दर्शन सिंह बल और लक्ष्मी स्पोर्ट्स के संचालक शंकर राय साहब उनके परम मित्रों में भाई जैसा स्थान रखते थे। पिछले सात  मई 2021को प्रो दर्शन सिंह बल चाचा जी का जाना हम सब के लिए अपूर्णीय क्षति थी। बल चाचा जी का होना और उनका साया हमारी ताकत थी। दो दोस्तों का अनूठा प्रेम आज भी उनकी यादों के बीच हमारे परिवार में जीवंत है । आखिरी वक्त में 15 अगस्त 2016 को उन्होंने ध्वजारोहण कर तिरंगे को सलाम किया। इंजीनियरिंग कालेज बिलासपुर में अपनी सरकारी सेवा के दौरान अनेक सामाजिक साहित्यिक सांस्कृतिक आयोजनों को संचालित किया। ध्वजारोहण के पर्व का संचालन उन्होंने आजीवन किया। बहुत सी यादें हैं। आंखें नम है आगे लिखना कठिन है।आप सबका स्नेह, सहयोग और आशीर्वाद हमारे परिवार पर बना रहे। शत् शत् नमन।
             डा शाहिद अली ,शिक्षाविद्, रायपुर


रिपोर्ट : चंपारण नीति समाचार संपादक की कलम से प्रस्तुत

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