( लेखक -: डॉ राहुल रंजन )
संसद में क्या होना चाहिए, किन मुद्दों पर चर्चा और बहस होनी चाहिए। इस सवाल का जवाब तलाशने पर कभी उत्तर नहीं मिला और मिला भी तो उससे संतुष्टि नहीं हुई। देश के उन सभी मतदाताओं को आज भी यह नहीं पता कि देश की संसद आखिर है किसलिए। करोड़ों के चुनाव और करोड़ों के संसदीय सत्र होते हैं। जिन लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाकर मतदाता संसद में भेजते हैं वह वहां जाकर करते क्या हैं। लोग यह जानते हैं कि संसद नियम कायदे बनाती है और देश के विकास के लिए योजनाएं को मंजूरी के साथ पैसा देने का काम करती है। यह सच है लेकिन कई दशकों से संसद के सत्र सिर्फ बहस और हंगामें के पर्याय बन गए हैं। यहां अब जिस तरह की बहसें होती हैं उससे देश शर्मशार होता है। यहां देश को लेकर कोई चिंतातुर दिखाई नहीं देता। सत्ताधारी दल हो या फिर विपक्ष। नए सांसद हों या फिर पुराने, अनुभवी, बुजुर्ग , सबके सब संसद को अखाड़ा बनाने पर तुले हुए हैं। यहां अक्सर उन मुद्दों पर चर्चा और हंगामा होता है जिसका देश की आम जनता से वास्ता नहीं। कभी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा तो कभी देश के गौरव को लेकर गले फाडेÞ जाते हैं सार्थविहीन इन चर्चाओं का कोई औचित्य नहीं होता, इन मुद्दों की बहसों का नतीजा भी कुछ नहीं निकलता लेकिन संसद का वक्त बर्बाद हो जाता है। फिलहाल संसद में संविधान पर घमासान मचा हुआ है, अंबेडकर साहेब के बलिदान को याद किया जा रहा है और इसी बहाने उन लोगों को चेताता जा रहा है जो इस असहिष्णुता के मुद्दे को हवा दे रहे हैं। धर्म निरपेक्षता पर भी सवाल उठा है इस शब्द को कब और कैसे संविधान का हिस्सा बना दिया गया इस पर बहस भी शुरू है। गृहमंत्री राजनाथ अपनी कड़क आवाज में सेक्यूलर शब्द के इस्तेमाल को लेकर नाराज हैं उनका मानना है कि वर्तमान राजनीति में इस शब्द के इस्तेमाल के कारण देश में सद्भाव बनाने में दिक्कत आ रही है। उन्होंने कहा कि सेक्युलर शब्द का अर्थ पंथ निरपेक्ष है ना कि धर्म निरपेक्ष, इस शब्द से भविष्य में होने वाले विवाद का अंदेशा डॉ.अंबेडकर को था इसलिए उन्होंने इस शब्द को संविधान में शामिल नहीं किया। राजनाथ साहब धर्मनिरपेक्ष शब्द के इस्तेमाल के पक्ष में नहीं वह इस पर वेन लगाना चाहते हैं। खैर ऐसी चर्चाओं से देश के लोगों के सामने कुछ ऐसी सच्चाइयां आ जाती हैं जिन्हें वह नही जानते। देखिए, आज की पीढ़ी ही नहीं बल्कि अधेढ़ हो चुकी पीढ़ी भी भारत को धर्मनिरपेक्ष देश ही समझती आई है उनका भ्रम तो टूटा कि हमारा देश धर्मनिरपेक्ष नहीं बल्कि पंथ निरपेक्ष है। अब पंथ पर बहस आगे बढ़ेगी और बखिया उधेड़ी जायेगी। अभी कांग्रेस सत्ताधारी भाजपा को संविधान विरोधी कहकर खींसे दिखा रही है वही इस मुद्दे पर बहस आगे बढ़ी तो हंगामे दीवार पर खड़ी हो जायेगी, क्योंकि कहीं न कहीं इंदिरा गांधी का नाम भी लिया जायेगा और जब नाम आयेगा तो फिर कांग्रेस को आग लग जायेगी, सोनिया के पीछे खड़ी होकर कांग्रेस संसद को चलने नहीं देगी। संसद ऐसे ही मुद्दों पर बहस में उलझी रहे, विपक्ष की रणनीति यही रहती है और सत्तापक्ष शोर और हंगामे के बीच देशहित की रक्षा करने में जुटा रहे। मोदी के पीएम बनने के बाद संसद का कोई सत्र ऐसा नहीं रहा जिसमें आमराय किसी प्रस्ताव पर बनी हो। इस स्थिति में सुधार संभव नहीं है। हंगामें में विकास के रास्ते पर बहस संसद में कब होगी इसका इंतजार करना होगा।
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